Wednesday, 9 May 2012

जल के लिए युद्ध और कचड़ाघर बनती नदियाँ |—- डॉ. दिलीप कुमार सिंह’


जल के लिए युद्ध और कचड़ाघर बनती नदियाँ |—- डॉ. दिलीप कुमार सिंह’
संपूर्ण पृथ्वी का सबसे अनोखा तत्व  जल है तथा नदियाँ सदैव ही मानव सभ्यता का केंद्र बिंदु रही हैं| मानव ने आदिकाल से ही अमृत तत्त्व कि खोज में अपना अमूल्य समय गंवाया है | जबकि जल ही वास्तविक रूप में अमृत है |
धरती जल कि उपस्थिति से ही परम विचित्र एवं स्रष्टि संपन्न हो सकी है |प्रथ्वी तीन चौथाई जल से ढकी होने के कारण ही अंतरिक्ष से नीली दिखाई देती है |
जल हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के मिश्रण से बना है तथा यह एक गंध हीन रंगहीन स्वाधीन तत्व है जो अशुद्धियों के मिलने के कारण ही खरा या मीठा बन जाता है | प्रथ्वी का संपूर्ण जल वाष्पित हो कर बादल, कोहरा,ओस , बन जाता है जो बाद में वर्षा के रूप में बरस कर नदियों द्वारा सागरों और महासागरों में मिल जाता है | शेष कूप,बावडियों और तालाबों में जमा हो जाता है |


करोडो वर्ष पूर्व से सन १९९० इ० तक पूरी धरती पे स्वच्छ जल के तमाम स्त्रोत विधमान थे |कल कल छल छल बहती नदियों का स्वच्छ जल पीने सहित हर काम में आता था | तब यह हरी भरी धरती वृक्षौ,लताओं से आच्छादित थी | मानवकृत प्रदुषण नाम मात्र का ही था | परन्तु दो दशकों में ही मानवकृत उधोग धन्धों ,प्लास्टिक कचड़ा एवं प्रदूषण के चलते जल्स्त्रूत कुंवे,बावडी,तलब सूखने लगे नदियाँ पटने लगी | जीवनदायिनी स्वच्छ अम्रुल जल युक्त नदियाँ पूरी तरह कचड़े से पट गयी | कई नदियाँ तो सूख गयी तथा धारा कि प्रवाह मात्रा बहुत घट गयी |
“मानोतो मैं गंगा माँ हूँ न मानो  तो बहता पानी ‘ कि तर्ज़ पे पूजा के योग्य नदियों में आज का पढ़ा लिखा विज्ञानं प्रेमी तकनिकीदक्ष मानव मलमूत्र त्याग रहा है | नदियों में कसाई घरों का चमड़ा, मांस और खून बहा रहा है|  धार्मिक मानव मूर्खतावश नदियों में फूलमालाएं  आदि कचरों बग रहा है |
जिस देश में नदियों को माताकह के बुलाते हैं वहाँ आज माँ तुल्य नदियों को यह मानव नाबदान से भी बदतर बनाता चला जा रहा है | इसका पानी अब पीने योग्य तो दूर अब नहाने योग्य भी नहीं बचा | अब यह कला और विषैला होता जा रहा है |
जौनपुर का ही उदाहरण ले लें जहाँ पे १९८५ इ० के बाद कोई बाढ़ नहीं आयी है और न तो किनारों पे जमा विराट मात्रा में जमा मलमूत्र एवं गन्दगी बह सकी है | गोमती नदी  का प्रवाह गर्मी में नालों की तरह दीखता है | जलप्रवाह की भीषण कमी का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि परम पवन विराट गंगा भी इलाहाबाद,वाराणसी इत्यादि नगरों में बेहद सिकुड के रह गयी है | लोग बे खौफ नदी के पेट में घुसकर अव्वास, संस्थान,निवास बनाते जा रहे हैं | इसका परिणाम बेहद भयानक एवं विनाशकारी होगा |
भारत सहित अधिकांश देशों में औधोगिक तकनीकी वैज्ञानिक क्रांति के कारण तालाब , कुवें, पोखर नदियाँ, मृत होते जा रहे हैं | इनको पुनर्जीवित करने का अथवा जल के पुनार्दोहन (recycling) का प्रयास नहीं किया जा रहा है | केवल भारत नहीं बल्कि विश्व भर में नदियों कि स्थिति चिंताजनक हो रही है | जल का सबसे भीषण भरा विनाशकारी उपयोग अधोगिक संसथान कर रहे हैं तथा विषैला और रेडियो प्रदूषित जल नदियों समुद्रों में डाल रहे हैं | प्रकति द्वारा दिए  पानी के विराट स्त्रोत के बावजूद केवल एक प्रतिशत ही अब पीने योग्य बचा है | ६६% नदियों का जल अब पीने योग्य नहीं है | हालत इतने खराब हैं कि १०% विशिष्ट व्यक्ति  सभी स्त्रोतों से प्राप्त ९०% बिजली और पानी खत्म कर देते हैं और ९०% व्यक्तियों के केवल १०% विद्युत औत जल इस्तेमाल करने को मिलता है |भारत में जलस्तर प्रतिवर्ष ३ मीटर नीचे भाग रहा है |
अब चिल्लाने से कुछ नहीं होगा | अतिआवश्यक उधोग,क्रांति,तकनीकी तत्काल ही छोडकर “प्रकृति कि गोद में लौटना” धर्म अध्यात्म नैतिकता अपना लेना ही अमृततुल्य जल एवं जीवनदायिनी नदियों के संरक्षण का  एक मात्रा उपाय है |

2 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

आपका हार्दिक स्वागत है, सर .

Alok Mohan said...

khash baat ye hai ki is taraf kisi ka dhyan bhi nhi hai aur koi khuch kerna bhi nhi chahta

बढ़िया प्रस्तुती

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